शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

जमाना


इस ज़माने को मैं कैसे जमाना कह दूँ 
जमाना तो वो था जिसमे हम जवान हुए

वो मीठे बोल में छुपी शरारतें और वो सुहावनी रातें 
वो चाँद की ही गोद थी जिसमे हम जवान हुए 

अब कहाँ सुनता हूं मैं वो पाजेब की छन-छन 
मिटटी का वो आगन था जिसमे हम जवान हुए 

ना पडोसी से है कोई रिश्ता ना अपनों से है नाता 
वो गली-कूचे थे जिसमे हम जवान हुए....

इस ज़माने को मैं कैसे जमाना कह दूँ 
जमाना तो वो था जिसमे हम जवान हुए 
अक्षय-मन 


29 टिप्‍पणियां:

  1. चित्र और रचना दोनों एक दुसरे को सार्थक कर रही हैं...

    सही है, उम्र के इस पड़ाव पर आकर ज़माने को देखकर व्यक्ति बस यही तो कहता सोचता है...

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  2. अब कहाँ सुनता हूं मैं वो पाजेब की छन-छन
    मिटटी का वो आगन था जिसमे हम जवान हुए

    ना पडोसी से है कोई रिश्ता ना अपनों से है नाता
    वो गली-कूचे थे जिसमे हम जवान हुए....
    Bahut khoob,Akshay!

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  3. बहुत ही खुबसूरत यादो की ग़ज़ल....

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  4. बदल गया है ज़माना ... बहुत खूबसूरत रचना

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  5. aapke blog par bahut pahle aai rahi magar baad me koi link nahi raha aur nahi pai aaj aapki badi bahan ke jariye pahunchi yahan aur pyaari rachna bhi padhi aap sada hi sundar likhte aaye hai .koi shak nahi isme jamana kafi badal gaya .sundar .

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  6. सच है कि वो बात नहीं...सुन्दर रचना,

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  7. इस ज़माने को मैं कैसे जमाना कह दूँ
    जमाना तो वो था जिसमे हम जवान हुए

    क्या बात है .....

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  8. ना पडोसी से है कोई रिश्ता ना अपनों से है नाता
    वो गली-कूचे थे जिसमे हम जवान हुए...
    बहुत सुंदर भावाव्यक्ति


    इस ज़माने को मैं कैसे जमाना कह दूँ
    जमाना तो वो था जिसमे हम जवान हुए
    सच है ...

    सुन्दर रचना
    हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !


    मित्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाओ के साथ

    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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  9. अक्षय मन जी बहुत अच्छा प्यारी अभिव्यक्ति सच में वो क्या जमाना था और आज दिखावा ..दूरी ..
    देवी की कृपा से आनंद आ गया
    शुक्ल भ्रमर

    ना पडोसी से है कोई रिश्ता ना अपनों से है नाता
    वो गली-कूचे थे जिसमे हम जवान हुए...

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  10. वो मीठे बोल में छुपी शरारतें और वो सुहावनी रातें
    वो चाँद की ही गोद थी जिसमे हम जवान हुए!!

    बहुत सुंदर रचना

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  11. बहुत सुन्दर रचना बधाई ..मैंने भी कुछ इसे ही शेर लिखे है

    सजा करती थी चौपालें ,पुराने नीम के नीचे
    मगर अब गांव मैं उनके कोई चर्चे नहीं होते |
    वो पीली घास के छप्पर ,दीवालें काछी माटी की ,
    बुजुर्गों से भरे पूरे वो चौबारे नहीं होते

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  12. ▬● बहुत खूबसूरती से लिखा है आपने... शुभकामनायें...

    दोस्त अगर समय मिले तो मेरी पोस्ट पर भ्रमन्तु हो जाइयेगा...
    Meri Lekhani, Mere Vichar..
    .

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  13. पिछले कुछ दिनों से अधिक व्यस्त रहा इसलिए आपके ब्लॉग पर आने में देरी के लिए क्षमा चाहता हूँ...

    इस रचना के लिए बधाई स्वीकारें...शीघ्र स्वास्थ्य लाभ करें.

    नीरज

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  14. बहुत सुन्दर, बधाई.
    कृपया मेरे ब्लॉग "meri kavitayen"पर भी पधारने का कष्ट करें, आभारी होऊंगा.

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  15. Really Praise worthy.... nice collection of words and rhym... and rhythm and above all photo of old age couple is heart touching.!!!!!

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  16. Really praise worthy... collection of words, rhym and rhythm excellent and above all your photo selection is too suitable as per your work and heart touching.

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  17. खूबसूरत रचना...अच्‍छी प्रस्‍तुति...बहुत बहुत बधाई...

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  18. kya baat he.....me bhi saath dunga akshay..... ki

    aaj bedardi ki aah, likh rahi he har kalam!
    wo utsawon ke raag the jisme hum jawaan hue!!

    tu likhe ya main likhoon, geet nij mann hi saje!
    wo shhama -e- mehfilen theen, jisme hum jawaan hue!!

    Ehsaas****

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  19. जमाना तो वो था जिसमे हम जवान हुए
    शुक्रिया !आपकी लेखनी से आज हम बयाँ हुए....!

    अच्छा लगा यहाँ आकर !
    खुश रहें स्वस्थ रहें !

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