इस ज़माने को मैं कैसे जमाना कह दूँ
जमाना तो वो था जिसमे हम जवान हुए
वो मीठे बोल में छुपी शरारतें और वो सुहावनी रातें
वो चाँद की ही गोद थी जिसमे हम जवान हुए
अब कहाँ सुनता हूं मैं वो पाजेब की छन-छन
मिटटी का वो आगन था जिसमे हम जवान हुए
ना पडोसी से है कोई रिश्ता ना अपनों से है नाता
वो गली-कूचे थे जिसमे हम जवान हुए....
इस ज़माने को मैं कैसे जमाना कह दूँ
जमाना तो वो था जिसमे हम जवान हुए
अक्षय-मन



















चित्र और रचना दोनों एक दुसरे को सार्थक कर रही हैं...
प्रत्युत्तर देंहटाएंसही है, उम्र के इस पड़ाव पर आकर ज़माने को देखकर व्यक्ति बस यही तो कहता सोचता है...
अब कहाँ सुनता हूं मैं वो पाजेब की छन-छन
प्रत्युत्तर देंहटाएंमिटटी का वो आगन था जिसमे हम जवान हुए
ना पडोसी से है कोई रिश्ता ना अपनों से है नाता
वो गली-कूचे थे जिसमे हम जवान हुए....
Bahut khoob,Akshay!
suhani yado ki gazal
प्रत्युत्तर देंहटाएंbahut khoob
प्रत्युत्तर देंहटाएंAchchi abhivayakti Akshay
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत ही खुबसूरत यादो की ग़ज़ल....
प्रत्युत्तर देंहटाएंबदल गया है ज़माना ... बहुत खूबसूरत रचना
प्रत्युत्तर देंहटाएंaapke blog par bahut pahle aai rahi magar baad me koi link nahi raha aur nahi pai aaj aapki badi bahan ke jariye pahunchi yahan aur pyaari rachna bhi padhi aap sada hi sundar likhte aaye hai .koi shak nahi isme jamana kafi badal gaya .sundar .
प्रत्युत्तर देंहटाएंbahut hi umdaa aur pyaari rachna
प्रत्युत्तर देंहटाएंसच है कि वो बात नहीं...सुन्दर रचना,
प्रत्युत्तर देंहटाएंइस ज़माने को मैं कैसे जमाना कह दूँ
प्रत्युत्तर देंहटाएंजमाना तो वो था जिसमे हम जवान हुए
क्या बात है .....
सचमुच, मन तो दर्पण के समान ही होता है।
प्रत्युत्तर देंहटाएं............
ब्लॉग के लिए ज़रूरी चीजें!
ना पडोसी से है कोई रिश्ता ना अपनों से है नाता
प्रत्युत्तर देंहटाएंवो गली-कूचे थे जिसमे हम जवान हुए...
बहुत सुंदर भावाव्यक्ति
इस ज़माने को मैं कैसे जमाना कह दूँ
जमाना तो वो था जिसमे हम जवान हुए
सच है ...
सुन्दर रचना
हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !
मित्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाओ के साथ
-राजेन्द्र स्वर्णकार
अक्षय मन जी बहुत अच्छा प्यारी अभिव्यक्ति सच में वो क्या जमाना था और आज दिखावा ..दूरी ..
प्रत्युत्तर देंहटाएंदेवी की कृपा से आनंद आ गया
शुक्ल भ्रमर
ना पडोसी से है कोई रिश्ता ना अपनों से है नाता
वो गली-कूचे थे जिसमे हम जवान हुए...
सुन्दर रचना
प्रत्युत्तर देंहटाएंवो मीठे बोल में छुपी शरारतें और वो सुहावनी रातें
प्रत्युत्तर देंहटाएंवो चाँद की ही गोद थी जिसमे हम जवान हुए!!
बहुत सुंदर रचना
बहुत सुन्दर रचना बधाई ..मैंने भी कुछ इसे ही शेर लिखे है
प्रत्युत्तर देंहटाएंसजा करती थी चौपालें ,पुराने नीम के नीचे
मगर अब गांव मैं उनके कोई चर्चे नहीं होते |
वो पीली घास के छप्पर ,दीवालें काछी माटी की ,
बुजुर्गों से भरे पूरे वो चौबारे नहीं होते
▬● बहुत खूबसूरती से लिखा है आपने... शुभकामनायें...
प्रत्युत्तर देंहटाएंदोस्त अगर समय मिले तो मेरी पोस्ट पर भ्रमन्तु हो जाइयेगा...
● Meri Lekhani, Mere Vichar..
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बहुत सुन्दर रचना बधाई .....
प्रत्युत्तर देंहटाएंsundar rachna
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