शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

जमाना


इस ज़माने को मैं कैसे जमाना कह दूँ 
जमाना तो वो था जिसमे हम जवान हुए

वो मीठे बोल में छुपी शरारतें और वो सुहावनी रातें 
वो चाँद की ही गोद थी जिसमे हम जवान हुए 

अब कहाँ सुनता हूं मैं वो पाजेब की छन-छन 
मिटटी का वो आगन था जिसमे हम जवान हुए 

ना पडोसी से है कोई रिश्ता ना अपनों से है नाता 
वो गली-कूचे थे जिसमे हम जवान हुए....

इस ज़माने को मैं कैसे जमाना कह दूँ 
जमाना तो वो था जिसमे हम जवान हुए 
अक्षय-मन 


20 comments:

  1. चित्र और रचना दोनों एक दुसरे को सार्थक कर रही हैं...

    सही है, उम्र के इस पड़ाव पर आकर ज़माने को देखकर व्यक्ति बस यही तो कहता सोचता है...

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  2. अब कहाँ सुनता हूं मैं वो पाजेब की छन-छन
    मिटटी का वो आगन था जिसमे हम जवान हुए

    ना पडोसी से है कोई रिश्ता ना अपनों से है नाता
    वो गली-कूचे थे जिसमे हम जवान हुए....
    Bahut khoob,Akshay!

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  3. बहुत ही खुबसूरत यादो की ग़ज़ल....

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  4. बदल गया है ज़माना ... बहुत खूबसूरत रचना

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  5. aapke blog par bahut pahle aai rahi magar baad me koi link nahi raha aur nahi pai aaj aapki badi bahan ke jariye pahunchi yahan aur pyaari rachna bhi padhi aap sada hi sundar likhte aaye hai .koi shak nahi isme jamana kafi badal gaya .sundar .

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  6. सच है कि वो बात नहीं...सुन्दर रचना,

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  7. इस ज़माने को मैं कैसे जमाना कह दूँ
    जमाना तो वो था जिसमे हम जवान हुए

    क्या बात है .....

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  8. ना पडोसी से है कोई रिश्ता ना अपनों से है नाता
    वो गली-कूचे थे जिसमे हम जवान हुए...
    बहुत सुंदर भावाव्यक्ति


    इस ज़माने को मैं कैसे जमाना कह दूँ
    जमाना तो वो था जिसमे हम जवान हुए
    सच है ...

    सुन्दर रचना
    हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !


    मित्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाओ के साथ

    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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  9. अक्षय मन जी बहुत अच्छा प्यारी अभिव्यक्ति सच में वो क्या जमाना था और आज दिखावा ..दूरी ..
    देवी की कृपा से आनंद आ गया
    शुक्ल भ्रमर

    ना पडोसी से है कोई रिश्ता ना अपनों से है नाता
    वो गली-कूचे थे जिसमे हम जवान हुए...

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  10. वो मीठे बोल में छुपी शरारतें और वो सुहावनी रातें
    वो चाँद की ही गोद थी जिसमे हम जवान हुए!!

    बहुत सुंदर रचना

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  11. बहुत सुन्दर रचना बधाई ..मैंने भी कुछ इसे ही शेर लिखे है

    सजा करती थी चौपालें ,पुराने नीम के नीचे
    मगर अब गांव मैं उनके कोई चर्चे नहीं होते |
    वो पीली घास के छप्पर ,दीवालें काछी माटी की ,
    बुजुर्गों से भरे पूरे वो चौबारे नहीं होते

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  12. ▬● बहुत खूबसूरती से लिखा है आपने... शुभकामनायें...

    दोस्त अगर समय मिले तो मेरी पोस्ट पर भ्रमन्तु हो जाइयेगा...
    Meri Lekhani, Mere Vichar..
    .

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  13. बहुत सुन्दर रचना बधाई .....

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