शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

बेखुदी


बेखुदी में भी क्या खुमारी है 

ये ज़िन्दगी अब कहाँ हमारी है 

मर तो जाते हम बरसो पहले 
भूल जाते गर,ये जान तुम्हारी है 

                                         बेखुदी में भी क्या खुमारी है 
ये ज़िन्दगी अब कहाँ हमारी है 

आहिस्ता से इन धडकनों को छुओ 
दिल को मेरे कोई बीमारी है

लुटने को दर पे खड़ा तेरे "अक्षय"
कहने को तो ये भिखारी है...

                                           बेखुदी में भी क्या खुमारी है 
ये ज़िन्दगी अब कहाँ हमारी है 
अक्षय मन 

2 टिप्‍पणियां:

  1. भैय्या , किसे दिल दे चुके हो .. हमें तो बताओ ..
    बहुत सुद्नर गज़ल .. मज़ा आ गया पढकर

    आभार

    विजय

    कृपया मेरी नयी कविता " फूल, चाय और बारिश " को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html

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