शनिवार, 18 अक्तूबर 2008

मिस यू पापा

ये पन्ने हैं जिंदगी के इनमे आपका पता तलाशता हूं
आप खो गए हैं मगर अब बस आपकी यादों का हिसाब
संभालता हूं

बस एक पन्ना खाली छुटा है मेरी इस किताब का
बात वो अधूरी छोड़ गए बोले,बेटा अभी बताता हूं

बस मेरे मे ही सीमित है आपके रूप का हर रंग
अपने जिस्म के हर हिस्से को आपमे ही बसाता हूं

गुजरते बचपन के साथ वक्त भी ये गुजर जाएगा मगर
गुजरे हुए कल की गलियों से मै अब भी गुजरता हूं

मेरा मुक़द्दर तो देखो ये मुझे छोड़ मेरे अपनों पर कहर ढाता है
इसलिए जिस्म छोड़ कभी-कभी आपके साथ निकल पड़ता हूं

अकसर बचपन मे आसमानों मे छिपे राज आप सुनाते थे मुझको
अब क्यूँ नही बरसते आसमां से आप,देखो तो जरा मे कितना गरजता हूं

अक्षय
-मन


6 टिप्‍पणियां:

  1. kavita to bahut maarmik hai aur behad khubsurat bhi....antim do panktiyan to aur bhi behad......magar mai soch me par gaya hoon ki kya ye hakikat hai?

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  2. yahin hein papa..tumhare saath..tumhari yaadon mei...

    bahut sundar yaaden samet rakhi hein...

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  3. yahin hein papa..tumhare saath..tumhari yaadon mei...

    bahut sundar yaaden samet rakhi hein...

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  4. एक मर्मस्पर्शी कविता, पिता का स्नेह अपनी संतान पर हमेसा ही बना रहता है |

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