बुधवार, 5 नवंबर 2008

कहाँ गई वो मधुशाला

बूंद-बूंद है श्रापित किन्तु जहर नही वो अमृत-प्याला
तुझ बिन मेरा हाल हुआ क्या कहाँ गई वो मधुशाला
मन-सागर की लहरों से मिल जाए बहती कोई अश्रु-धारा
हर मोज से आवाज उठे फिर कहाँ गई वो मधुशाला !!

घूँट-घूँट से प्यासा हूं अविरल भटकूं मतवाला
बहके-बहके मन से छलके खोई हुई वो मधुशाला
बार-बार बोले तू , ये है मेरा अन्तिम प्याला
छलका-छलका फिर पीता है पिए जाए पीनेवाला
कहाँ गई वो मधुशाला,कहाँ गई वो मधुशाला !!

होठों से है आग बरसे ,नयनो से निकले एक ज्वाला
कतरा-कतरा ढूंढे है मिल जाये कही तो मधुशाला
पी-पीकर खेलूं जिस्म से अपने आत्मा से मैं हूं हारा
सुबह उठ फिर पूछुं तुमसे रात का वो अँधियारा और
कहाँ गई वो मधुशाला,और कहाँ गई वो मधुशाला !!

मदिरा संग मुग्द मैं रहा जैसे संग हो कोई ब्रज-बाला
नशे मे डूबे दोनों हैं चाहें मैं आवारा,चाहें वो हो मुरलीवाला
उसको नशा था यौवन का मुझको नशा किसी जोगन का
तडपे दोनों कुछ ऐसे, जैसे दोनों से रूठी हो मधुशाला
और "अक्षय" जो ख़ुद से बेखबर हैं वो पूछें हैं
कहाँ गई वो मधुशला,कहाँ गई वो मधुशाला
अक्षय-मन

9 टिप्‍पणियां:

  1. अक्षय जी आप ने बच्चनजी की अमर कृति मधुशाला की जमीन पर अपने शब्द रोपने का प्रयास किया है....मधुशाला में एक भाव है...छंद है जिसे अथक प्रयास से ही लिखना सम्भव है...आप का प्रयास सराहनीय है लेकिन अभी बहुत मेहनत मांगता है... आप में अपर संभावनाएं हैं इसलिए लिखना छोडिये मत...जितना अपने आपको मथेगें उतना ही मख्खन प्राप्त होगा...लिखते रहें.
    नीरज

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  2. रोशन चिराग के जैसे हो रहे हो रोशन...दुनिया में नाम कमाओगे...

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  3. बहुत अच्छा लगा पढ़कर बहुत सुन्दर

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  4. sachhi baat kahi pinewala yu bhi bahane dundhe,aur dhunde wo madhushala aur hud ka sharir jalaye,bahut hi achhi rachana lagi.

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  5. naam kijiyega lekhan ki duniya me...
    aap me apar sambhavana nazar aati hai.......
    agar fursat ho to mere blog par ek nazar dijiyega.....

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  6. अब न रही वो पीने वाले.. अब न रही वो मधुशाला..
    अक्षय... तुम्हे अंदाजा भी नहीं होगा.. के तुमने क्या लिख दिया है और कितना गहरा लिख दिया है...!!!!

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  7. अब न रही वो पीने वाले.. अब न रही वो मधुशाला..
    अक्षय... तुम्हे अंदाजा भी नहीं होगा.. के तुमने क्या लिख दिया है और कितना गहरा लिख दिया है...!!!!

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