मंगलवार, 18 नवंबर 2008

जिंदगी जैसी चिता ना हो !!

जलती हुई इस रात मे सुलग रहा हूं मैं और
धुंआ बन उड़ रहा है ये वक्त ...
कुछ नही तो एक झोंका मेरी सांसों का सुलगते इस
जिस्म को और भी जला जाता है ...
जिंदगी की इस चिता मे जलती आग को और तेज़
भड़का जाता है ...
ना राख बन बिखरता हूं
ना मौत से मिलता हूं
जिंदगी की ना बुझने वाली चिता मे
जिन्दा ही जलता हूं !
गरजती तो हैं बिजलियाँ बेबस हो मजबूरियों से लेकिन
बरसती नही ये मौत ...
जो इस जलती चिता को कभी तो बुझा दे
कभी तो बरस ऐ मौत जिंदगी की इस जलती चिता पर
कभी तो इस जलते जिस्म की प्यासी रूह को अपनी आगो़श
मे ले और डूब जाने दे अपनी गहराइयों मे जहाँ कोई
स्वार्थी आग और जिंदगी जैसी चिता ना हो !!
अक्षय-मन

20 टिप्‍पणियां:

  1. na rakh ban..na maut se milna...

    bhaut khub jidnagi jinda chita..wah kya andaz hai...magar sirf likhne me rahe dua yahi hogi meri
    sakhi

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  2. bahut badiya mere dost
    bahut se bhaavo ko ek saath jod kar mulywaan rachna banayi hai

    sirf ek galti " aahosh " ke staan par :aghosh' ko likhe de , ye aapki choti si typing error hai kyonki "G " aur "H " paas paas hai .

    yaar aap mujh jaise hi emotional ho ..

    keep it up..

    vijay

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  3. बहुत गहरे आंसुओं की जिल्द में लिपटे भाव,
    बहुत झ्क्झोरनेवाला ........पर उम्र नए ख्वाब संजोने की है
    और इसके लिए ज़िन्दगी अभी गा रही है.......

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  4. आप बेशक बहुत आगे जायेंगे...शुभकामनाएं. बस जारी रहिये.

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  5. ना मौत से यूं मिलते रहो
    ना राख बन बिखरते रहो
    ज़िंदगी की अबूझ चिता में
    यूं रात दिन निखरते रहो

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  6. Bahut umda, lekin jindagi ko itne nakaratmak nazarie se dekhne ki umr nahi aapki. Try to think & write positivelly.

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  7. अक्षयजी, लाजवाब ब्‍लाग बनाया है आपने कवितायें भी लाजवाब... बधाई।

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  8. yaar aajkal kaunsii chakki kaa aataa khaa rahe ho ..............saala jo likh rahe ho achaa likh rahe ho ...........

    weldone bhai ..........mast jaa rahe ho ......


    manas

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  9. " bhut gehri dard kee anubhutee krati aapke ye rachna dil ko kaheen gehre tk chu gyi hai..."

    Regards

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  10. आपके बुलावे का धन्यवाद, ...इस कविता को समझने लायक नहीं रहा मैं...क्षमा करं...आग तो अवश्य दिखती है...पर कुछ अलग संदर्भ हैं....फ़िर कभी सही...आपके निमन्त्रण का धन्यवाद.....उम्मेद साधक

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  11. बहुत अच्छी कविता,बधाई
    अशोक मधुप

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  12. बहुत बढिया रचना है।बधाई स्वीकारें।

    ना राख बन बिखरता हूं
    ना मौत से मिलता हूं
    जिंदगी की ना बुझने वाली चिता मे
    जिन्दा ही जलता हूं !

    बहुत सही कहा है।

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  13. garajti to hai bijaliyan bebas ho majburiyon se lekin......... wah kya khub likha hai ,gahari abhibyakti dali hai bahot hi umda lekhan.... dhero badhai aapko........

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  14. बहुत भावपूर्ण!
    'लकड़ी जल कोयला भई,कोयला जल भयो राख
    मैं बिरहन ऐसी जली, कोयला भई न राख।'
    बधाई और शुभकामनायें।

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  15. bahut hi achcha likha hai
    zindagi chita hi hai har pal jalte rehna hai
    chita to ek bar jalati hai magar zindagi ki chita mein pal pal jalna hai
    aapne zindagi ko dekhne ka jo nazaria diya hai bilkul sahi diya hai
    zaindagi khud ek jalti chita hai

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