गुरुवार, 5 जून 2008

अपराजिता


कभी आतिश कभी बारिश कभी संगनी बन जाती है
हार से जो ह्रास न हो अपराजिता कहेलाती
है अपराजिता , अपराजिता

अपनी उक्ति पर हो जो अटल
अपने शब्दों पर हो जो अविचल
सबसे बढकर हो जिसकी अस्मिता
वो कहेलाये अपराजिता,अपराजिता

संघर्ष से जो हो न तंद्रा
जीत,लहू की जो पी ले मदिरा
विजय होने की जिसमे हो तम्यता
वो कहेलाये अपराजिता,अपराजिता

अपने हो कम उसके ,लाखों हो दुश्मन जिसके
समय से हार न माने वो चलती रहे पूरी लगन जो
तेज-दीप्ति दर्पण हो हर नारी का, रूप हो जिसका आदर्शता
तभी तो वो कहेलाएगी अपराजिता,अपराजिता

अब नही झुकना है मुझे चाहें करो कितने भी सितम
अब मर-मर के ना जीना मुझको हुआ है मेरा पुनर्जन्म
अब नही मानुंगी मैं हार,नही हूं अब मैं तेरी अभाग्यता
अब कहोगे तुम ख़ुद मुझको अपराजिता अपराजिता !!

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