रविवार, 15 जून 2008

ग़लतफहमी


आज की दुनिया ग़लतफहमी पर कायम है
अगर हुई जरा सी भी दूर ग़लतफहमी तो तीसरे विश्वयुद्ध का जन्म है

बेटे ने माँ को ग़लतफहमी का शिकार बनाया
उसकी ममता भरी आँखों पर अपने तुच्छ
चाल चरित्र का पर्दा डाल छुपाते हुए
अपने को उसका आज्ञाकारी बेटा बताया

प्रेमी ने प्रेमिका को ग़लतफहमी का शिकार बनाया
उसके समर्पण को अपने मनोरंजन का समान बनाया
दिल को खिलौना समझ तोड़ दिया
फिर प्यार को एक कालीरात समझ भूल गया

प्रजातंत्र ने प्रजा को ग़लतफहमी का शिकार बनाया
प्रजाहित का झूठा प्रण कर प्रजा को अंधेरो में रखा
खुद बन निशाचर उनके विश्वास को लूट अपनी झोली भरता रहा

यहाँ तक की भगवान् तक को नहीं छोडा
उसे भी ग़लतफहमी का शिकार बनाया
अपनी वंदना-साधना से नहीं
उनको भी पैसो का लालची समझा और खूब धन चढ़ा
अपने आप को उनका भक्त बताया
अपना विज्ञापन भगवान् से करा
अपनी कम्पनी का नाम बढाया

पाप ने पुण्य को ग़लतफहमी का शिकार बनाया
गंगा को पापो का प्रश्चित करने का स्थान बताया
पहेले खूब पाप किये फिर एक डुबकी मात्र लगा लेने से
अपने आपको स्वर्गभोगी बनाया

आज के फेशन ने मेरी संस्कृति को ग़लतफहमी शिकार बनाया
अपनी मातृभूमि का रूप न ले अपने को अमेरिकन बेटा बनाया
हाँ सही भी है अब क्या कहूं
जो अपनी माँ के दिए रूप को निराकार बोलेगा
वो मातृभूमि के रूप को कैसे स्वीकारेगा

शब्दों की इस दुनिया में सब शब्दों की गलतफ्हेमियां हैं
अपने शब्दों से बना विश्वास का खोखला कवच उड़ाकर
उनकी भावनाओ के साथ खेलना बहुतो की आदत रही है
शब्दों को निम्न-निम्न खाचों में डाल हर बार एक नया आकार दे
दिन बदले शब्दों के रूप बदले
किस पर विश्वास करूं
कौन-कौन सी गलतफ्हेमियां दूर करूं
कुछ समझ नहीं आता
बोलो अब मैं क्या करूं ?
अब मैं क्या करूं ?

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