शनिवार, 2 अगस्त 2008

आध्यात्मिक प्रेम



जाने किस चिन्तन में
डूबा है ये अज्ञात मन ,
हो-हो व्याकुल ये तड़पे
जर्जर-जर्जर हो सारा जीवन !

किस बात की पीड़ा है तुझको
क्यूँ ढलता तेरा ये यौवन ,
तेरे नयनो की ज्योति से
अब क्यूँ न हो मेरा मन मोहन !

मर-मर जाती है अब तेरे
होठो से आती वो बतियाँ,
ये बदला सा क्यूँ रूप है तेरा
क्यूँ खिलने से पहले मुरझाई कलियाँ !

तेरी इस व्याकुलता से
जागे मेरी सोई रतियाँ ,
पहचाने ना तू मुझको भी
क्यूँ खो दी तुने सारी सखियाँ !

कौन-सा रोग है तुझको हुआ
मुझको अब कुछ सूझे ना ,
नयनो से टपके अश्रुओं को
षधि समझ तू पी लेना !

मैं तुझको क्यूँ छु ना पाउं
क्यूँ मेरी पुकार तू सुनती ना ,
बन पगला आगे-पीछे मैं डोलूं
तू मुझको दिख-दिख जाए
मैं तुझको क्यूँ दिखता ना !!

12 टिप्‍पणियां:

  1. साथी यदि इसी प्रकार से आप अपने महफूज की निदा को परिधान देते रहे, अर्थात काव्य में पिरोते रहे, तो खुद-व-खुद आपका चित उस महान भाव जगत् में स्थिर होने लगेगा.

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  2. साथी यदि इसी प्रकार से आप अपने महफूज की निदा को परिधान देते रहे, अर्थात काव्य में पिरोते रहे, तो खुद-व-खुद आपका चित्त उस महान भाव जगत् में स्थिर होने लगेगा.

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  3. वाह, अच्छी लगी आपकी कविता और उस कविता में आपके विचार भी.. !!

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  4. bahut achha ...har baar ki tarh bahut he aapke pass likhney ko likhtey rahey malum nahi aur koi likhe na likhe aap ka likha dil tak utarta he

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  5. कौन-सा रोग है तुझको हुआ
    मुझको अब कुछ सूझे ना ,
    नयनो से टपके अश्रुओं को
    औषधि समझ तू पी लेना !......... इस प्रेम को समझना आम जनजीवन में आसान नहीं है,
    इस प्रेम को मूक हृदय से समझा जा सकता है........शब्दों की परिधि से ऊपर की भावना है यह

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  6. कौन-सा रोग है तुझको हुआ
    मुझको अब कुछ सूझे ना ,
    नयनो से टपके अश्रुओं को
    औषधि समझ तू पी लेना !

    bhaut achha likhte hai aap akshay

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  7. bahut khub likha hai akshay.....prem ki anubhuti har chhhand se hoti hai..

    ..Ehsaas!

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  8. pyar kee vyakulta tumne........bahut vyathith tarike se pesh kiya hai.........
    u r great akshay!!


    mukesh sinha

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  9. aapke paas bhaav bhaasha kee
    bhaageerathee hai.....achchha likhte hain aap.....
    likhte rahen nirantar...

    shubh-kamnaen

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  10. Tumhare ehsaasko mai kis tarah tumhen mehsoos karaun??Mai kin alfazonka prayog karun? Ye rachna...aur sirf yahee nahee, tumharee har rachna a-varnaneey hai...is ehsaasko mai shabdomen nahee piro saktee, itnee sashakt rachnaye khud b khud sab kuchh keh detee hain...stabdh kar detee hain..
    Mai apne blogpe likhne aayee thee par ab bina kuchh likhe laut rahee hun...tumhare ehsaasonka itna zabardast asar hai ki is waqt mai use mitake, alag karke kuchhbhi likh nahee paungi...

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