शनिवार, 3 जनवरी 2009

प्रकृति की गोद में पलता हुआ पत्ता


बड़ती हुई दरख्त का सुखा हुआ पत्ता
आधियों की फुँकार से उड़ता हुआ पत्ता

जाने कहाँ वो जाएगा ये हवाओं का रुख बताएगा
कौन-सी राहों को ढूंढ़ता,भटकता हुआ पत्ता

काटों की चुभन,फूलों की सुगंध बस शाख पर
है सूनापन उससे फिरसे बिछड़ता हुआ पत्ता

उड़ते कब तक न थकेंगे एक डाल बैठेंगे परिंदे
उन्हें सूरज की धुप में छाव देता तपता हुआ पत्ता

मेरा सर्दियों की धुप में बदन को सेकना
यहाँ हर मौसम की मार सहता हुआ पत्ता

नशा बहुत है इन घटाओं मे शायद किसी
मधुबन की तलाश में डोलता हुआ पत्ता

सनसनाहट हुई है हवाओं में कुछ
बहारों के गीत गुनगुनाता हुआ पत्ता

कोई क्या जाने इस पत्ते की कीमत
सासों को सासों से सीता हुआ पत्ता

जब किनारों को किसी की तलाश न हो
नदियों को पुकारता आकाश न हो
तब-तब लहरों के संग लहरता बहता हुआ पत्ता

कोई रिश्ता,नाता सिर्फ़ खून से ही नही पनपता
देखो यहाँ प्रकृति की गोद में पलता हुआ पत्ता
अक्षय-मन

25 टिप्‍पणियां:

  1. अक्षय जी
    खूबसूरत लिखा है, लाजवाब

    नव वर्ष मंगल-मय हो

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  2. हर कोई इस पत्ते की किस्मत को नहीं समझ सकता,
    उसे वही देख,सुन सकता है,
    जो इस तरह ज़िन्दगी की राहों को पार करता हो.........
    बहुत ही शानदार

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  3. bahot badhiya bhavabhibyakti ki hai akshya tumne bahot khub likha hai bahot sahi chhote bhai...god bless you......

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  4. जब किनारों को किसी की तलाश न हो
    नदियों को पुकारता आकाश न हो
    तब-तब लहरों के संग लहरता बहता हुआ पत्ता

    कोई रिश्ता,नाता सिर्फ़ खून से ही नही पनपता
    देखो यहाँ प्रकृति की गोद में पलता हुआ पत्ता
    bahut gehrai se har bhv simta hai sundar

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  5. बहुत सुंदर लिखा है आपने

    कोई रिश्ता,नाता सिर्फ़ खून से ही नही पनपता
    देखो यहाँ प्रकृति की गोद में पलता हुआ पत्ता

    यह बहुत अच्छा लगा

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  6. sukhe patte ke sare bhav sundar prastut huye bahut hi lajawab. badhai.

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  7. बहुत ही उम्दा लिखते हैं आप

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  8. बहुत निराले और खूबसूरत अंदाज़ की रचना है ये आपकी...मेरी बधाई स्वीकार करें.
    नीरज

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  9. 'jaane kahan jayega wo..ye hawaon ka rukh batayega'..waah!
    Akshay ,aap ki kavita bahut hi bhaavpuran hai..aap bahut aagey tak jayengey..aisey hi khubsurat likhtey raheeye.

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  10. bahut hi badhiya...har pankti mein khud ko khota aur pata hua patta,zindagi ke har utar chadhav ko sahta hua patta..................bahvnayein bahut achche se ukeri hain

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  11. मन साहब, वाक़ई बहुत ख़ूबसूरत थी पत्ते पर यह कविता आपकी.
    वाह वाह !
    निकात की इस्लाह लाज़मी है आपको, उसके बाद तो क्या कहना !

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  12. hello akshay..
    bahut khoobsoorti ke sath likha hai..
    wakai mein maza aaya padh kar..
    hope to read u more..
    god bless...
    likhte rehiye...

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  13. dear hero , i am sorry , i am late on your blog , i was on tour, kya karen bhai naukri men nakra kaisa...
    this is my poem ,, you have honoured me by writing something on nature, which i suggested to you.
    saari ki saaai panktiyan sundar hai .. bhaavpoorn hai . lekin mujhe sabse acchi ye laghi , hawaon ka rukh batayenga ki ye kahan jayenga aur koi rishta naata khoon se nahi banta , kya hero ,ye mere liye hai kya beta..
    good , main badhai nahi doonga , bus ye kahunga ki God bless you .. aur likho behtar likho ..
    maa sarswati ki aasim krupa ho..
    vijay

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  14. कोई रिश्ता,नाता सिर्फ़ खून से ही नही पनपता
    देखो यहाँ प्रकृति की गोद में पलता हुआ पत्ता
    ....अतिसुन्दर प्रस्तुति, साधुवाद !! मेरे ''यदुकुल'' पर आपका स्वागत है....

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  15. आखिरी से पहले वाला अंतरा तीन पंक्तियों का क्यूँ लिया.........अपनी पंक्तियों ऐसा भी क्या मोह....!!उन्हें कहीं और इस्तेमाल कर लेते.....!!सब चीज़ों एक जगह डालने का लालच छोड़ दो... एक ग़लत पंक्ति भी गड़बड़ कर देती है....आपकी ये रचना भी बड़े अच्छे भावों वाली है....अगर आपने कुछ शब्द उलट-पुलट कर लिए होते....तो कुछ और ही बात हो सकती थी....जल्दबाजी नहीं....बल्कि पूरे इत्मीनान से रचना को पोस्ट करें.....कुछ चीज़ें छोडनी पड़ सकती हैं....तो बिना मोह के एक पल में उन्हें छोड़ दीजिये.....!!बस आपकी रचना और भी ज्यादा उम्दा हो जायेगी....शब्दों के साथ हर वक्त खेलने का हिसाब-किताब ना बिठाएं....बल्कि गहरे अर्थों वाली रचनाओं में उनके भीतर(शब्दों के भीतर) ही उतर जाएँ....उनमें डूब ही जाए.....!!

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  16. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  17. dear akshaya,bahut dino ke baad aaj mile ho kahan chaldete ho bina bataye .you have impressed us by your inteligentia so much that we feel ourselves in alienation without your comments and views.Its good for me that you are back again atleast for me .Very nice poem with greatsense of imotions,but please mind the kind and timely advice from dear bhootnath [no Mr.Rajeev, according to you]It will help you alot
    with love
    yours ever dr.bhoopendra

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