रविवार, 7 जून 2009

कलयुग की सीता

वहां देखो वो खड़ी अभिलाषा है,जिंदगी ने
धिक्कारा उसे परन्तु जीने की आशा है
नारी है लाचारी है,पहने फटी-पुरानी साड़ी है
अपना तन न ढक कर अपना बच्चा,
अपना आँचल संभाली है.......
दुखों के सागर में
सुखों का किनारा नही
डूबती है हर पल
उसे तिनके का सहारा नही...
इसके पश्चात् भी उसके नयनों में
कोई क्रोध,कोई प्रतिशोध नज़र नही आता
भूखी है,अध्नंगी है हर कोई उसे देखता जाता
बच्चा बिलखता,वो रोता जब बूंद-बूंद छाती से
दूध पानी बन निकलता.....
उसपर ये समाज कहता....
ये वक्त-वक्त की बात है.....
किसी ने दो शब्द कहे थोड़ा अफ़सोस किया
और वहां से अपने रास्ते चल दिया....
तुम्हारे पास वक्त नही....
और कहते हो वक्त-2 की बात है ....
वाह रे ! दुनिया क्या यही वक्त की परिभाषा है?????
नहीं- नहीं ये तो स्त्री है वक़्त के हाथों की कठपुतली है...
वक़्त को ये नहीं वक़्त इसे बदलता है
क्यूंकि हर पुरुष इसे अपने से कमजोर समझता है
कमजोर है क्यूंकि रीति-रिवाजों के बन्धनों में बंधी है....
क्या यही इस समाज का खोखला,अधूरा ढांचा है.....?
क्या यही वक़्त की परिभाषा,अधूरी अभिलाषा है.... ?
ये वक्त आज है यही वक्त कल भी था...
जब कोई सीता कुछ न कर पाई थी
क्यूंकि वो एक स्त्री थी...
यहाँ इस समाज में तब से अब तक न जाने कितनी सीता
जन्म लेकर आई होंगी और आती रहेंगी...
और न जाने कौन-कौन सी कसौटियों पर
अग्नि परीक्षा देती रहेंगी.....

क्या ये अभिलाषा भी सीता का ही रूप है ????????? अक्षय-मन

25 टिप्‍पणियां:

  1. "Seeta" aur "abhilasha" saath, saath rahee, rahengi...sach hai,ki, auratki "jayaz" abhilasha ko bhi "swarth" mana gaya aur agniparikshake baadbhi vanvaashi mila.
    Yahee to sawal maine apne "Duvidha"ke sansmaran me khada kiya tha..aisa kyon,ki, kabhi kisi yugme purush apnee satv pariksha detahee nahee...har samay aurat ko kyon majboor kiya jata hai?"aurat ke zinda jalneko qurbaanee aur balidaan kaha"...!
    shama

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  2. वाह............सोचने को मजबूर करती है आपकी कविता............. सीता को तो हर दौर में अग्नि परीक्षा देनी पड़ी है .......... आज भी इस परीक्षा में वो खरी उतरेगी............... दिल को छूने वाली रचना

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  3. Akshay kabhi apni koyi rachana mere blogpe post karoge? Tumaree rachnayen, behad sundar hotee hain...gar mere blogpe hon, to kabhi kabar, bina tumhra blog khole, apni maa yaa kisee saheli ko unhen suna sakti hun...

    Jiaseki "mai"," Mera man mandir"...ye sabhi rachnayen vilakshan pratibha shaalee hain...

    http//kavitasbyshama.blogspot.com

    Ab mere 13 blogs hain," kavitaa " blogki URL dee hai...
    snehsahit
    shama

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  4. औरत पर रची गयी .....और मेरे द्वारा पढी गयी चंद...बहुत सुन्दर रचनाओं में से एक..लिख कर रख lee है....

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  5. वाह बहुत ही सुंदर रचना है. धन्यवाद

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  6. क्या कहूँ.....??
    अगर स्त्री बहिस्कार करती है तो परिवार टूटते हैं.....!
    अगर पुरुष अपनी सोच में थोडा सा बदलाव ली तो गृहस्ती सुखमय हो सकती है .....!!

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  7. adbhut...har lihaaj se...dang reh gaya hoon aapki is rachne pe...ye bhi darshaata hai ki aap kitne complete kavi hai jo aurat ki maarmil vedna k is kadar bayaan kar rahe hai...hats off

    www.pyasasajal.blogspot.com (mujhe khushi hogi agar aap ek baar padhaare)

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  8. keep writing dear honey.you can write better poems if u will choose subjects of yr own experience.concentrate on rythm if u use them.
    we are happy that u started writing again.
    my love, best wishes and blessings.
    bhoopendra

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  9. main hairaan hun ki aap akshay ,is chhoti umar mein itni gahari kavita likh rahey hain.
    bahut hi achhcee bhavabhivyakti hai.
    shayd ab tak ki yah aap ki sab se achchee rachnaon mein hogi.

    likhtey raheeye..shubhkanayen

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  10. yaar

    tum to aise na likhte the ... kya likha hai beta .. sach kahun to ab aisa lag raha hai ki indore aakar tere haath hi choom loon...

    waaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaah

    waaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaah

    waaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaah

    akshay this is your very best , you have entered into a new phase of writing and I really liked it..

    regards
    vijay

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  11. padhte padhte rongte khade ho gaye aur aankh mein aansoo aa gaye..........kitna sajeev chitran kiya hai .......koi fark nhi hai kal aur aaj ki sita mein ya yun kaho kal ki aur aaj ki nari ki dasha mein........wo kal bhi abla thi wo aaj bhi abla hi hai.

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  12. AKSHAY ITANI CHHOTI SI UMRA ME NAARI KE PRATI JO AAPKE DIL ME JAGAH HAI SAATH HI JO AADAR AUR SAMAAN HAI WO IS KAVITAA KE JARIYE SAAF TAUR SE NAJAR AARAHAA HAI.... NAARI KO YE SAMAAN APNE AAP ME PRASHANSANIYA HAI JO AAPKO UTKRISHTH AUR PRANGAT BANAANE KE LIYE BEHAD JARURI BHI HAI AUR AAP BANEGE BHI... AAPKI YE KAVITAA BEHAD PASAND AAYEE... BADHAAYEE



    ARSH

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  13. baat to aapne bahut sahi kahi hai..
    samaj per achcha kataksh hai..
    parntu kavita jitne sudar tarike se shuru huyi .. ant tak vaisi nahi chali... beech me aur layatmakta laane ki jarurat hai.. parantu bhav vakai bahut acche hai..

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  14. लाजवाब रचना के लिए ढेर सारी बधाइयाँ!

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  15. akshay! kaise soch lete hain aap .... naari ko itni gahrai se.... kabhi kabhi to lagta hain......koi comment hi na karoo.....khamosh rahoon..... I salute you & ur mother too... God bless you !

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  16. seetah ki vidambana ko aap nay samjha, par is paribhasha may aapnay Ram ko doshi kar dia....
    kya sachmuch raam ka dosh tha ko seenay par patthar rakh kar apni ardhangini ko apnay honay walay bhavishya kay saath jungle kay agraatvaas kay liyay bhejna pada....
    Guru On ka aadesh tha ki yadi seeta ko agyaatvaas may nahi bhejengay to Raghukul par say sab ka vishvaas uth jaega....
    Kaun tha seeta, Ram, Gurudev aur Ayodhya ki vidambana ka kaaran? Ek malechch?.....
    Malechch ki soch hi hamesha say klesh ka kaaran rahi hai....
    itni baar agni pareeksha denay aur sati kay roop may sidhdh honay par bhi....itni vidambana sehnay par bhi.... kya koi malechch aaj bhi seeta par lanchan lagaanay say chooka?
    Yadi ek malechch kay kehnay par seeta ko ghar tyagna pada....yadi aisa na kia hota, toh malechch sach may hi Raghukul par say vishvaas tyag detay....

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  17. सीता की विडम्बना तो आपने जानी मेरे दोस्त
    पर क्या भारत माँ की विडम्बना में सीता नहीं दिखीं आप को ?
    एक समय ऐसा भी रहा जब भारत माँ सजी सवरी दुल्हन सी दिव्य सुन्दरता की परिभाषा थी ....
    एक समय ऐसा भी रहा जब भारत माँ के लाल अपने तेज़ , अपनी अद्वितीय सामर्थ्य से पूरे विश्व में सबसे अधिक ओजस्वी थे....
    कौन खा गया सारा सामर्थ्य, कहाँ विलुप्त हो गएय भारत माँ के ओजस्वी पुत्र....
    एक ऐसा भी दिन था जब स्त्री पुरुष सब परम्पितः की संतान थे, कोई भेद न था और स्त्री सीता सी पूज्य थी....
    कहाँ से आया ये भेद पुरुष और नारी के बीच में.... कौन है नारी की विडम्बना का कारण?
    अपनी मलेछ सोच का ज़हर भारत माँ के पुत्रों के सीने माय बो कर
    लूटता आया है मलेछ आज तक.... और भारत माँ शांत देख रही है अपने पुत्रों को लुटते है....
    क्यूंकि भारत माँ के ओजस्वी पुत्र कहीं खो गए हैं....
    सुनना बंद कर दिया है माँ का दर्द पुत्रो ने...
    और अब म्लेच्छ अपनी चाल में कामयाब होता दिख रहा है....
    अब तो भारत माँ के लाल सिर्फ स्वयं की आवाज़ सुनते हैं....
    यदि भारत माँ के लाल फिर से अपने उसी गर्व में आ जाएँ....
    यदि भारत माँ के लाल फिर से अपने उसी ओजस्वी सामर्थ्य में आ जाएँ....
    किसकी हिम्मत है और किसकी मज़ाल जो सीता को फिर से विडम्बना का सामना करना पडे....
    राम के दुःख से आँख फेर लेने से सत्य नहीं बदलेगा मेरे मित्र,
    सत्य बदलेगा जब मलेछ की दी हुई बीमारी इस धरती से जाएगी.....

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  18. А я вот сессию сдала наконец-то!!! И кто придумал летом учиться, из года вгод, убеждаюсь, что это полный бред. Крыша едет, как у нас студентов, так и у преподов! Ну невозможно в такую жару сидеть в душных аудиториях.
    Кстати, те кто скажет, что кондиционер - это спасение в жару, глубоко ошибаются. У нас в группе 2 человек с бронхитом слегли!!!
    В общем, всем студентам - сил и упорства в сдаче экзаменов, а тем кто сдал - поздравляю с началом лета для нас!!! УРА!!!!

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