शनिवार, 20 जून 2009

एक लेखक को मेरा पत्र "तुम क्या लिखते हो ?"

मेरे शब्दों ने मुझे नई पहचान दी या मेरे दर्द ने कहना जरा मुश्किल है लेकिन तुम कहो मैं तुमसे पूछना चाहता हूं तुम्हारा दर्द कितना गहरा है कितनी गहराई में डूबे हैं तुम्हारे शब्द,अपने ही शब्द इन कोरे पन्नो पर भरते हुए क्या तुम तन्हा होते हो?क्या उसी तन्हाई में तुम्हारी आत्मा जीवित होती है जो जानती है सच्चाई को,सच्चाई जीवन की, सच्चाई मृत्यु की,सच्चाई सुख,सच्चाई दुःख की, "बिना दर्द के कलम नही उठती होगी तुम्हारी बहुत भारी जो है सच्चाई में बहुत बजन होता है दर्द का कहीं ना कहीं हाथ थामना पड़ता होगा"अपने पीड़ित मन को कहाँ ले जाते हो तुम समझाने के लिए क्या उन पन्नो के पीछे हाँ उन पन्नो के ही पीछे शायद जहाँ तुम अपने दर्द अपने जज्बातों को बिखेर देते हो शब्दों के रूप में.....
तो मैं तुमसे पूछता हूं
तुम क्या लिखते हो ?
किसी बच्चे,किसी अनाथ का रोना या
किसी गरीब का भूखे पेट आलापना
तो मैं तुमसे पूछता हूं
तुम क्या लिखते हो ?
किसी विधवा की कुछ पुरानी यादें या
किसी तलाकशुदा की अकेली काली रातें
तो मैं तुमसे पूछता हूं
तुम क्या लिखते हो ?
किसी की आंखों का वो सुना-सुना इंतज़ार या
किसी के झूठे वादे,ठुकराया हुआ प्यार
तो मैं तुमसे पूछता हूं
तुम क्या लिखते हो ?
किसी नई-नवेली दुल्हन की टूटती चूड़ीयाँ या
रिश्तों के बंधन में बंधी मज़बूरी की बेड़ियाँ
तो मैं तुमसे पूछता हूं
तुम क्या लिखते हो ?
देश की मज़बूरी,नेताओं का अत्याचार या
किसी शहीद का बलिदान उसका रोता परिवार
तो मैं तुमसे पूछता हूं
तुम क्या लिखते हो ?
किसी अबला पर उठी निगाहें उसका बलात्कार या
बम फटने की कहानी वो आतंकवाद वो नरसंघार
तो मैं तुमसे पूछता हूं
तुम क्या लिखते हो ?
माँ-बाप के आंसूं बेटी की विदाई या
बेटों की डांट माँ-बाप की पिटाई
तो मैं तुमसे पूछता हूं
तुम क्या लिखते हो ?
तुम क्यूँ लिखते हो ?
ये दर्द तुम्हारा नही फिर भी
इस अजनबी दर्द को कैसे जी लेते हो ?

यदि मैं भी इस दर्द को जीने लग जाउं
तो तुम,तुम ना रहो और मैं,मैं ना रहूं ?
शायद मेरे सवालों का यही जवाब है..........अक्षय-मन

25 टिप्‍पणियां:

  1. aaj to kavita ka tashan hi different hain....Likhte ho kyoki shabdo se pyar hain...bahavo samvednao ki parakh hain.....aur apne saath dusro ke ehsaso ka bhi ehsaas hain ...... simple

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  2. बहुत बढिया!!
    दूसरो की पीड़ा वही समझ सकता है जो स्वयं उस पीड़ा को सह चुका हो।

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  3. बहुत सुन्दर ,अति सुन्दर ,शुभ कामनाएं
    अनन्त अन्तरिक्ष से जब है एक मौन झरता ,
    शब्द जीवन्त होते जब वह है अंतर मन में भरता ||

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  4. gajab ke tewar dikhe bhaee aaj ke is kavitaa me .. har sawaal sachhayee se rubaru karaati hui hai... ye sach me hame puchhani hi chahiye ke ham kya likhte hai....kamaal ka vishay hai aaj ke is kavitaaa me .... dhero badhayee


    arsh

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  5. दर्द से मुक्ति पाने का लेखन माध्यम है।

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  6. तुम क्‍या लिखते हो,
    तुम क्‍यों लिखते हो,
    ये दर्द तुम्‍हारा नहीं फिर भी,
    इस अजनबी दर्द को कैसे जी लेते हो ।

    बहुत ही वजनदार शब्‍द हैं आपके, जिसके लिये बधाई ।
    यदि कवि मन ना होता तो शायद इनमें से एक लाइन भी लिखना मुश्किल होता, तभी तो कहते हैं जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि ।।

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  7. कविता नही दास्तान लिख दी है आपने तो ----
    अपने सवालो के ज़वाब भी खूबसूरती से निभाया है --
    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति के लिये बधाई

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  8. waah bahut khub AKSHAYA JI aap jo kuchh kawita ke introduction me kahi hai .........wah ek aise wyktitaw ko darshaata hai jo behad samwedansheel hai .............jo aapki kawita ke har ek pankti byaan karati dikhati hai ...........aapko hamari bahut saari shubhkamanaaye

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  9. kise ke dard ko mehsoos karne wale dil khas hote hain...........aur tum unmein se ek ho........bahut hi khoob likha hai........aise hi jwalant vishyon par likhte raho.

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  10. बहुत ही खूबसूरत अहसास, अपनी बात व्यक्त करने की कला ब-खूबी जानते हो तुम, इसी तरह लिखते रहो और हमलोग तुम्हारे लेखन का आनंद उठाते रहें, खुश रहो

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  11. सही उकेरा है सहज अहसासों को!!

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  12. बहूत ही सहज रचना है ...............दर्द का एहसास हो तो इतनी अच्छी रचना लिखी जा सकती है.........

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  13. दूसरों के दुःख-दर्द को अपनें संवेदनात्मक मन के प्रश्न बना जीना यही तो परकाया प्रवेश है। सुंदर।

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  14. लेखकीय आत्मा की अभिव्यक्ति। मन को भा गया और दिमाग तुष्ट हो गया। बहुत ही संवेदनशील और भावना एवं सच से ओत-प्रोत रचना। ईमानदारी की खूबसूरती के साथ।

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  15. तुम कवि हो ,इसीलिये उस दर्द को जी पाये हो ,, आगे---की पन्क्तियां---तुम तुम न रहो.....अर्थ हीन हैं, अति सुन्दर कविता में थेगडे की भांति.

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  16. तुम कवि हो इसीलिये दर्द को जी सके आगे की पन्क्तियां--तुम तुम न रहो--निरर्थक हैं---कवि कवि ही रहेगा , यदि कोई अन्य भी दर्द जीता है तो वह उसको भी लिखेगा, जीयेगा।

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  17. bahut achchaa likha hai....har dard jise ham mahsoos kare wo likh jata hai shabdo me khud dhal jata hai.

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  18. वाह इतना सुंदर रचना लिखा है आपने कि कहने के लिए अल्फाज़ कम पर गए! दिल को छू गई आपकी ये रचना! आपकी हर एक रचना में अलग अलग बात है इसलिए तो आपकी हर एक रचना बहुत ही ख़ूबसूरत है क्यूंकि आप दिल की गहराई से लिखते हैं! बहुत बढ़िया! आप इसी तरह लिखते रहिये!

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  19. Akshay ..
    deri se aane ke liye maafi chahunga...

    bahut der se ise padh raha hoon beta ... is baar to kavita ka dimensions hi kuch alag hai ... ek nayi soch aur ek naye shilp ki aor tumhara lekhan hai .. wakai me badhai ke paatr ho akshay .. bahut sundar.. man ko bha gayi.....

    kudos
    vijay

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  20. aap ki kavita men jindagi dikai deti hai, aap se muze prerna milegi

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  21. tumhari to har kabita me kuchh na kuchh khash hota hai........pr is kabita me kuchh bhut hi khash baat hai.......kehte hai ki jo insaan dard ko samjh skta hai wahi use panno pr bhi utar sakta hai...tumhare sawal aese the ki agr jabab tumne khud na likha hota to shayd jabab de pana muskil hota....or jo jabab hai tumnhare sawalo ke kya hai or kyun hai.uspe koi comments nhi kie ja skte....kyunki tumhari soch tk pahuch pana thoda sa muskil hai...tumhari is kabita pe jitni taliya bajai jae kam hai........akshay

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