बुधवार, 7 मई 2008

हमारे मन का रथ

अपने मनोबल अपने तपोबल से खिचो तुम मन के रथ को
आंसुओं की बारिश से बादलों की गुजारिश से सिंचो तुम मन के रथ को

आशाओं के भवर मैं शब्दों के नगर मैं बसाओ तुम मन के रथ को
बीती जुडी यादों से अनकही बातों से सजाओ तुम मन के रथ को

प्यार के बहाव से सांसों के चढाव से बढाओ तुम मन के रथ को,
बचपन की चहक से फूलों की महक से महेकाओ तुम मन के रथ को

आँखों की चमक से होंठो की भवक से जगाओ तुम मन के रथ को,
मन के साज से कोयल सी आवाज से गव्वाओ तुम मन के रथ को

ह्रदय के कम्पन्न से रुधिर की मिलन से मिलाओ तुम मन के रथ को,
अपनी वंदना से शब्दों की साधना से मंदिर बनाओ तुम मन के रथ को

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