मंगलवार, 13 मई 2008

कुछ भी कहे सकते हो


मेरी आस्था मेरा विश्वास हो तुम
मेरे जीवन का अनुराग हो तुम

मेरी कविताओं का श्रंगार हो तुम
मेरे शब्दों की अन्भुझी प्यास हो तुम

मैं सीप मेरा मोती हो तुम
मैं आकाश मेरी धरती हो तुम

मैं आगाज़ मेरा अंजाम हो तुम

मैं सवाल मेरा जवाब हो तुम
मैं पराजित मेरी आपराजिता हो तुम

मैं धड़कन, धड़कन का एहेसास हो तुम
मैं विकृत मेरी शक्ति हो तुम

मैं बागवान मेरा बाग़ हो तुम

>तुम्हे भी नहीं पता तुम क्या हो
तुम्हारा क्या स्वरूप है तुम्हारे कई रूप हैं
बस उनको देखने का नजरिया अलग अलग है....

तुम माँ,बहिन,बेटी,और पत्नी बनकर अटूट रिश्तो की अखंड ज्योत बन जाती हो
और उन रिश्तों को निभाने के लिए हर उस बलिदान को जो तुमने दिया है अपना फ़र्ज़ समझती हो

मगर एक बलिदान और भी है
इस नग्न समाज मैं एक और रूप भी है तुम्हारा
वो रूप है वेश्या का

जो हर बलिदान से बड़ा है आदमी की कभी न भुजने वाली हवस तुम्हारे दरवाजे पर ही दस्तक देती है

मुझे तेरे इस बलिदान से भी रक्षा-रुपी कवच नज़र आता है...
जो हर नारी की रक्षा मैं माँ दुर्गा का आशीर्वाद नज़र आता है

मगर तेरे इस बलिदान को भी बुरी नज़र से देखा जाता है
और तुझे एक गाली समझा जाता है

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