राम-नवमी …
-
धरती वन्दन देश की, जहाँ अयोध्या धाम.
कण कण में हैं बसे हुए, जन-जन के प्रभु राम.
9 घंटे पहले
•«♥»• मैंने अपने आपको क्षमा कर दिया है। बन्धु, तुम भी मुझे क्षमा करो। मुमकिन है, वह ताजगी हो, जिसे तुम थकान मानते हो। ईश्वर की इच्छा को न मैं जानता हूँ, न तुम जानते हो। रामधारी सिंह दिनकर •«♥»•
आपका क्या कहना है??
7 पाठकों ने टिप्पणी देने के लिए यहां क्लिक किया है। आप भी टिप्पणी दें।
बहुत दिनो बाद पुराने अन्दाज़ की गज़ल देखी…………बहुत सुन्दर भावाव्यक्ति।
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर रचना है। बधाई स्वीकारें।
जवाब देंहटाएंबेहतरीन रचना..बधाई स्वीकारें
जवाब देंहटाएंनीरज
how u honey?good post.keep wwriting,it will give u a new enjoyment of creativity.
जवाब देंहटाएंdr.bhoopendra
rewa
mp
haushle par gar apne ho yakeen
जवाब देंहटाएंsamandar par tum chal kar dekho......:)
sahi hai bhai...waise ye shabd tere liye hi hai..tum bahut aage jaoge:)
dil ko chhone wali rachnaen.
जवाब देंहटाएंbehtar disignining ke lie punah badhaee.
जवाब देंहटाएं