बुधवार, 9 जुलाई 2008

आईना


वजूद नहीं तेरा ऐ आईने हकीक़त क्यूँ बयान करता है

किसी गैर को नहीं तू खुद ही को बदनाम किया करता है

कोई तुझे कुछ नहीं समझता सिवाए एक बेजान के

फिर तू क्यूँ सबकी पहेचान बनता है

ऐ आईने हकीक़त क्यूँ बयान करता है



मेरी आँखों से मेरी मजबूरियां तू समझता रहा

चेहरा ढलता है हालातो से तू कहता है

ऐ आईने हकीक़त क्यूँ बयान करता है



मेरी गुमनामी मुझसे तू छुपाता रहा

मेरे सूनेपन को तू मेरी ही परछाइयों से ढकता है

ऐ आईने हकीक़त क्यूँ बयान करता है



मेरी बेजुबान आँखों से गिरे हैं कुछ कतरे

आंसू हैं या हैं पानी ये तू ही समझता है

ऐ आईने हकीक़त क्यूँ बयान करता है



"अक्षय" कहता है इसे पड़ा कीजिये

आईने से बहेतर कोई किताब नहीं

वो पन्ने पलकों से पलटते रहिये

जिनमे पुरानी यादों का हिसाब मिलता है

ऐ आईने तू हकीक़त क्यूँ बयान करता है
अक्षय-मन

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