रविवार, 27 जुलाई 2008

कभी-कभी


कभी-कभी ख़्याल आ जाता है
जिंदगी की किताब में जो पन्ने
मुड़ गए हैं उन्हें सवारने का ख़्याल आ जाता है
कभी-कभी ख़्याल आ जाता है

वो पन्ने कुछ इस तरहां घिरे हैं सवालो के घेरे में
वक्त गुजरता रहा हम पन्ने पलटते रहे उन सवालों
पर भी एक सवाल आ जाता है
कभी-कभी ख्याल आ जाता है

न जाने कौन सी सियाही से लिख रहे हैं हम इन पन्नो को
जब अश्क पानी न बन खून के रंग में ढल जाते हैं तब कलम
में ख़ुद-ब-ख़ुद कमाल आ जाता है
कभी-कभी ख्याल आ जाता है

अब सूरत भी नही दिखती इन किताबो में उनकी
न जाने हम उन्हें पड़ नही पाये या वो हममे ढल
नही पाये आज भी ये सवाल आ जाता है
कभी-कभी ख्याल आ जाता है

कोशिशें बहुत की वो गुलाब देने की उन्हें वो अब भी है
कैद किताबो के पन्नो में जब देखता हूं उसे न देने का
मलाल आ जाता है
कभी-कभी ख्याल आ जाता है


अब दो ही पन्ने बचें हैं जिन पर जिंदगी के हिसाब लिखने बाकि हैं
चार पन्नो की ही तो है ये कहानी मेरी दो पन्ने अनसुलझे सवालों में
निकल गए दो मलाल में फिर भी उस बेगाने का ख़्याल आ जाता है
कभी-कभी ख़्याल आ जाता है
कभी-कभी....
अक्षय-मन

6 टिप्‍पणियां:

  1. ये सवाल ताउम्र हमारा पीछा करते हैं,
    इन सवालों को बखूबी उतारा है,
    लगता है -
    ज़िन्दगी जवाब बनकर आ जायेगी.

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  2. yaar khyal achcha hai aa hi jata hai par aapko bahut khub aaya...

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  3. to kalam ka gaurav hai,
    ya kalam teri abhaa!
    jab jab padta hoon ras-bhav tere!
    ehsaas ye soch ulajh jata hai,
    koyee likh deta hai sagar sara, koyee ek bund ko taras jata hai...!
    kabhee-kabhee khayaal aa jata hai!!

    ...Bahut khub likha hai Akshay

    ...AKshayEhsaas!

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